Virtual School of Vedic Sanskrit

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Virtual School Of Vedic Sanskrit

वेदे सर्वं प्रतिष्ठितम्

आज के इस वैज्ञानिक युग में भी वेदों की प्राचीनता एवं नित्यता पर किसी को संदेह नहीं है । वस्तु आधारित विकास के स्थान पर जीव आधारित विकास के आधार पर ऋषियों ने  ध्यान की अवस्था में जिन विषयों का अनुभव अपने हृदय  गुहा में किया तथा जिनका प्रवचन अपने शिष्यों को सुनाया, इस अनुश्रवण पराम्परा  से श्रुति अर्थात वेद का प्रसार लोक में हुआ। 

 श्रवण एवं कण्ठस्थीकरण की प्रक्रिया ने वेद को आज भी अपने मूलरूप में सुरक्षित रखकर ईश्वर प्रदत्त  इस ज्ञान विज्ञान को  जीव आधारित विकास के लिए ब्रह्मा की परम्परा से ऋषियों को प्राप्त  हुआ। जिसके विस्तारक ब्राह्मण, आरण्यक  और उपनिषद हैं।  ज्ञान के इस शाश्वत स्वरूप को पीछे छोड़कर वस्तु आधारित विकास के दुष्परिणामों को ध्यान में रखते हुए हम इस वर्चुअल स्कूल ऑफ वैदिक संस्कृत के माध्यम से अपने भारतीय ज्ञान के प्राचीनतम स्वरूप एवं उसके  प्रभाव से विविध सामयिक विषमताओं के उन्मूलन के लिए यह उपक्रम आरम्भ किया गया है। जिससे वेद विद्या  के  स्वरूप रक्षित होकर  वस्तु आधारित विकास के आधार पर जीवाधारित विकास  को महत्त्व  मिलें तथा भारतीय ऋषि एवं कृषि संस्कृति की उन्नति हो सके।

वेदः शिवः शिवो वेदो वेदाध्यायी सदा शिवः।

 तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वेदमेव सदा पठेत्।।

वेद शिव हैं तथा शिव ही वेद हैं इसलिए वेद का स्वाध्याय करने वाला साक्षात् शिव ही होता है, इसलिए हमें सभी तरह के प्रयत्नों से वेद अवश्य ही पढना चाहिए I

डॉ. मदन मोहन तिवारी 

संस्थापक  वर्चुअल स्कूल ऑफ वैदिक संस्कृत

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